उत्तर प्रदेश

बच्चों पर बैन से नहीं, सोशल मीडिया सुधार से बनेगी बात

'दीवार टूटी हो तो खिड़की बंद कर दो'—क्या यही डिजिटल नीति है?

Sanjay singh
सरकारों को सोशल मीडिया की असली बीमारी का इलाज करने के बजाय सबसे आसान रास्ता मिल गया है—बच्चों पर प्रतिबंध लगा दो। सवाल यह है कि अगर प्लेटफॉर्म की एल्गोरिदमिक लत, जहरीला कंटेंट, फेक न्यूज़ और मुनाफे की अंधी दौड़ ही समस्या की जड़ है, तो सजा केवल बच्चों को क्यों? केवल आयु-आधारित प्रतिबंध मानसिक स्वास्थ्य की गारंटी नहीं है। असली जरूरत सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही तय करने, खतरनाक एल्गोरिदम पर लगाम लगाने, मजबूत कंटेंट मॉडरेशन, डिजिटल साक्षरता, गोपनीयता की सुरक्षा और प्रभावी अभिभावकीय नियंत्रण की है। लेकिन ऐसा करना कठिन है, इसलिए आसान रास्ता चुना जा रहा है—”घर की दीवार टूटी हो तो खिड़की बंद कर दो।”
प्लेटफॉर्म अरबों का मुनाफा कमाते रहें, नशे जैसी लत पैदा करने वाले फीचर चलते रहें, और सरकार उपलब्धि गिनाए कि उसने बच्चों को सोशल मीडिया से दूर कर दिया। सवाल अब भी वही है—असल जिम्मेदार कौन, बच्चा या मुनाफाखोर प्लेटफॉर्म?

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