डिजिटल ढोल, ज़मीनी सन्नाटा: आंकड़ों की पुलिस या जनता की सुरक्षा? लेकिन पुलिस व्यवस्था की असली परीक्षा जनता का विश्वास है
सरकार उपलब्धियों का ऐसा चमकदार पुलिंदा पेश कर रही है कि मानो उत्तर प्रदेश में अपराध अब इतिहास बन चुका हो। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, पुलिस ऐप, साइबर कमांडो, करोड़ों की बरामदगी, हजारों भर्तियां, नई जेलें, फास्ट ट्रैक कोर्ट और पुरस्कारों की लंबी सूची—सब कुछ सुनने में प्रभावशाली लगता है। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या आम नागरिक आज पहले से अधिक सुरक्षित महसूस करता है?

Sanjay singh
सरकार उपलब्धियों का ऐसा चमकदार पुलिंदा पेश कर रही है कि मानो उत्तर प्रदेश में अपराध अब इतिहास बन चुका हो। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, पुलिस ऐप, साइबर कमांडो, करोड़ों की बरामदगी, हजारों भर्तियां, नई जेलें, फास्ट ट्रैक कोर्ट और पुरस्कारों की लंबी सूची—सब कुछ सुनने में प्रभावशाली लगता है। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या आम नागरिक आज पहले से अधिक सुरक्षित महसूस करता है?
यदि तकनीक ही सुरक्षा की गारंटी होती, तो महिलाओं को शाम ढलने के बाद भय क्यों होता? साइबर हेल्प डेस्क और हजारों प्रशिक्षित कर्मियों के बावजूद डिजिटल ठगी लगातार क्यों बढ़ रही है? ऑनलाइन एफआईआर और ऐप के प्रचार के बीच थानों में आज भी आम आदमी को सम्मान और त्वरित न्याय क्यों नहीं मिलता?
सरकार बार-बार भर्ती और प्रशिक्षण के आंकड़े गिनाती है, लेकिन पुलिस व्यवस्था की असली परीक्षा जनता का विश्वास है, नियुक्तियों की संख्या नहीं। कानून-व्यवस्था का मूल्यांकन पुरस्कारों, पोर्टलों और डैशबोर्ड से नहीं, बल्कि उस नागरिक की सुरक्षा से होता है जो रात में बिना डर घर लौट सके।
दोषसिद्धि दर और अभियुक्तों की गिरफ्तारी के दावे भी तभी सार्थक हैं, जब निर्दोष भयमुक्त हों और पीड़ित को समय पर न्याय मिले। यदि व्यवस्था इतनी प्रभावी है, तो महिलाओं, व्यापारियों, किसानों और आम परिवारों में असुरक्षा की भावना समाप्त क्यों नहीं हुई?
सरकार तकनीक को उपलब्धि बता रही है, लेकिन तकनीक केवल एक साधन है, न्याय का विकल्प नहीं। मोबाइल ऐप अपराध नहीं रोकते; ईमानदार पुलिसिंग, निष्पक्ष जांच, जवाबदेही और संवेदनशील प्रशासन अपराध रोकते हैं।
सवाल यह नहीं कि सरकार ने कितने ऐप बनाए, कितने पोर्टल शुरू किए या कितने पुरस्कार जीते। असली सवाल यह है कि क्या इन सबके बाद नागरिक का जीवन अधिक सुरक्षित, अधिक सम्मानजनक और अधिक न्यायपूर्ण हुआ?
जब शासन उपलब्धियों का शोर बढ़ाने लगे, तब लोकतंत्र का कर्तव्य है कि वह एक ही प्रश्न पूछे—क्या आंकड़ों की चमक ज़मीन की सच्चाई को ढक सकती है?



