उत्तर प्रदेश

निजीकरण की तैयारी में लागू की गई वर्टिकल व्यवस्था विफल

विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश के केंद्रीय पदाधिकारियों ने कहा है कि उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन द्वारा निजीकरण की दिशा में उठाए गए कदमों के तहत राजधानी लखनऊ सहित प्रदेश के विभिन्न नगरों में लागू की गई विद्युत वितरण की तथाकथित "वर्टिकल व्यवस्था" पूरी तरह विफल साबित हो रही है। संघर्ष समिति ने इसे प्रबंधन की "पॉलिसी पैरालिसिस" का प्रत्यक्ष प्रमाण बताते हुए इस व्यवस्था को तत्काल समाप्त कर पूर्व की एकीकृत एवं प्रभावी व्यवस्था बहाल करने की मांग की है।

गोविन्द प्रजापति

लखनऊ। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश के केंद्रीय पदाधिकारियों ने कहा है कि उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन द्वारा निजीकरण की दिशा में उठाए गए कदमों के तहत राजधानी लखनऊ सहित प्रदेश के विभिन्न नगरों में लागू की गई विद्युत वितरण की तथाकथित “वर्टिकल व्यवस्था” पूरी तरह विफल साबित हो रही है। संघर्ष समिति ने इसे प्रबंधन की “पॉलिसी पैरालिसिस” का प्रत्यक्ष प्रमाण बताते हुए इस व्यवस्था को तत्काल समाप्त कर पूर्व की एकीकृत एवं प्रभावी व्यवस्था बहाल करने की मांग की है।

संघर्ष समिति ने कहा कि वर्षों से सुचारु एवं प्रभावी ढंग से संचालित विद्युत वितरण प्रणाली को निजीकरण के अनुरूप ढालने के उद्देश्य से वर्टिकल मॉडल लागू किया गया। इस प्रक्रिया में बड़ी संख्या में नियमित पद समाप्त कर दिए गए तथा हजारों संविदा कर्मियों को कार्यमुक्त कर दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप विद्युत व्यवस्था की कार्यक्षमता, विश्वसनीयता और जवाबदेही पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।

नई व्यवस्था के अंतर्गत 11 केवी एवं 33 केवी लाइनों तथा उपकेंद्रों के संचालन एवं अनुरक्षण कार्यों को राजस्व वसूली, वाणिज्यिक और मीटरिंग कार्यों से कृत्रिम रूप से अलग कर दिया गया है। इस विभाजन के कारण समन्वय पूरी तरह प्रभावित हुआ है। जहां पहले एक सहायक अभियंता तीन से चार उपकेंद्रों का प्रभावी संचालन करता था, वहीं अब उसे आठ से दस उपकेंद्रों का दायित्व निभाना पड़ रहा है। इसी प्रकार जूनियर इंजीनियरों तथा अन्य तकनीकी कर्मचारियों पर भी कार्यभार कई गुना बढ़ गया है, जिससे अनुरक्षण कार्यों की गुणवत्ता और गति दोनों प्रभावित हो रही हैं।

संघर्ष समिति ने कहा कि तकनीकी एवं वाणिज्यिक कार्यों के इस अव्यावहारिक विभाजन ने न केवल अनुरक्षण व्यवस्था को कमजोर किया है, बल्कि राजस्व वसूली भी अपेक्षित स्तर पर नहीं हो पा रही है। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि अनेक स्थानों पर 11 केवी एवं 33 केवी लाइनों तथा उपकेंद्रों के अनुरक्षण में लगे अभियंताओं और तकनीकी कर्मचारियों को भी राजस्व वसूली जैसे गैर-तकनीकी कार्यों में लगाया जा रहा है। इससे विद्युत प्रणाली के सुरक्षित एवं समयबद्ध अनुरक्षण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

संघर्ष समिति ने आगाह किया कि वर्षा की कमी और भीषण उमस के कारण प्रदेश में शीघ्र ही बिजली की मांग अपने उच्चतम स्तर पर पहुंचने की संभावना है। ऐसे समय में उपकेंद्रों, ट्रांसफार्मरों एवं विद्युत लाइनों का व्यापक और नियमित अनुरक्षण अत्यंत आवश्यक होता है। किंतु कर्मचारियों की भारी कमी तथा उपलब्ध तकनीकी स्टाफ को गैर-तकनीकी कार्यों में लगाए जाने के कारण फाल्टों का त्वरित निस्तारण नहीं हो पा रहा है, जिससे उपभोक्ताओं को अनावश्यक बिजली कटौती एवं लंबी बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है।

संघर्ष समिति ने चेतावनी दी कि यदि वर्तमान स्थिति में तत्काल सुधार नहीं किया गया तो बढ़ती विद्युत मांग के दौरान प्रदेश की विद्युत वितरण व्यवस्था गंभीर संकट में फंस सकती है, जिसका सीधा खामियाजा करोड़ों उपभोक्ताओं को भुगतना पड़ेगा।

संघर्ष समिति ने मांग की है कि वर्टिकल व्यवस्था को तत्काल समाप्त कर पूर्व की समन्वित एवं प्रभावी व्यवस्था बहाल की जाए, सभी रिक्त पदों पर शीघ्र नियमित भर्ती की जाए, कार्यमुक्त किए गए संविदा कर्मियों को तत्काल पुनः कार्य पर लिया जाए तथा बिजली कर्मियों पर की गई सभी उत्पीड़नात्मक एवं दंडात्मक कार्यवाहियों को बिना विलंब वापस लिया जाए। यही कदम प्रदेश में निर्बाध, गुणवत्तापूर्ण एवं विश्वसनीय विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हैं।

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