मऊ: जिला अस्पताल में सिर्फ 4 ICU बेड, रेफर और निजी अस्पतालों की लूट झेलने को मजबूर मरीज
जिले की करीब 25 लाख आबादी को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के दावों के बीच गंभीर मरीजों के इलाज की तस्वीर चिंताजनक है। जिले के 53 सरकारी अस्पतालों में केवल जिला अस्पताल में ही आईसीयू की सुविधा उपलब्ध है। यहां भी वर्तमान में महज चार आईसीयू बेड हैं। ऐसे में किसी गंभीर बीमारी या स्वाइन फ्लू के गंभीर मामलों में मरीजों को आईसीयू की जरूरत पड़ने पर सरकारी व्यवस्था सीमित साबित हो रही है और उन्हें निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है।

दिनेश प्रजापति
डॉ. धनंजय कुमार, सीएमएस, जिला अस्पताल मऊ
मऊ। जिले की करीब 25 लाख आबादी को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के दावों के बीच गंभीर मरीजों के इलाज की तस्वीर चिंताजनक है। जिले के 53 सरकारी अस्पतालों में केवल जिला अस्पताल में ही आईसीयू की सुविधा उपलब्ध है। यहां भी वर्तमान में महज चार आईसीयू बेड हैं। ऐसे में किसी गंभीर बीमारी या स्वाइन फ्लू के गंभीर मामलों में मरीजों को आईसीयू की जरूरत पड़ने पर सरकारी व्यवस्था सीमित साबित हो रही है और उन्हें निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है।
स्वास्थ्य विभाग की ओर से स्वाइन फ्लू को लेकर जिले के 12 बड़े सरकारी अस्पतालों में कुल 32 बेड के आइसोलेशन वार्ड तैयार किए जाने की बात कही जा रही है। जिला अस्पताल और टड़ियाव में 12-12 तथा प्रत्येक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर दो-दो बेड की व्यवस्था प्रस्तावित है। हालांकि, स्वाइन फ्लू की जांच की सुविधा केवल जिला अस्पताल में उपलब्ध होने से अन्य अस्पतालों में भर्ती संदिग्ध मरीजों को जांच के लिए वहीं निर्भर रहना पड़ता है।जिले में जिला अस्पताल, महिला अस्पताल और टड़ियाव में 100-100 बेड की क्षमता है। इसके बावजूद आईसीयू की सुविधा केवल जिला अस्पताल में है। वहीं 30-30 बेड की क्षमता वाले 10 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में भी आईसीयू की व्यवस्था नहीं है। इन केंद्रों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी भी लंबे समय से बनी हुई है।
जिला अस्पताल, महिला अस्पताल और 10 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की ओपीडी में रोजाना करीब 2,500 मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। इनमें मऊ के अलावा बलिया और गाजीपुर के मरीज भी शामिल हैं। जिला अस्पताल में अकेले रोजाना 900 से अधिक मरीज ओपीडी और इमरजेंसी में पहुंचते हैं। गंभीर मरीजों को आईसीयू की जरूरत पड़ने पर सीमित बेड के कारण तीमारदारों को परेशानी उठानी पड़ती है।
जिला अस्पताल में आईसीयू की शुरुआत दो वर्ष पहले दो बेड से हुई थी। मरीजों की बढ़ती संख्या को देखते हुए इसकी क्षमता बढ़ाकर चार बेड की गई। अब इसे आठ बेड का आईसीयू वार्ड बनाने की कवायद शुरू हो गई है। आईसीयू प्रभारी डॉ. अनिल कुमार के अनुसार, दो वर्षों में करीब 200 गंभीर मरीजों को आईसीयू में भर्ती कर उपचार दिया जा चुका है। क्षमता बढ़ने से एक साथ अधिक गंभीर मरीजों का इलाज संभव हो सकेगा।
सरकारी आईसीयू में इलाज पर प्रतिदिन औसतन तीन से चार हजार रुपये तक खर्च आता है, जबकि निजी अस्पतालों में यही खर्च 20 से 30 हजार रुपये या उससे अधिक पहुंच जाता है। जिला अस्पताल में आईसीयू बेड उपलब्ध न होने पर मरीजों के परिजनों के सामने निजी अस्पताल में उपचार कराने के अलावा अक्सर कोई विकल्प नहीं बचता।




