उत्तर प्रदेश

चूं-चूं करती दाना के लिए आने वाली ओ री गौरैया … घर-अंगना आ जा रे

आधुनिकता की दौड़ एवं मोबाइल टॉवरों के रेडिएशन से विलुप्त हो रही गौरैया का संरक्षण हमारी पृथ्वी के पर्यावरण हेतु बहुत उपयोगी है। घर आंगन से विलुप्त हो रही गौरैया की घर वापसी एक स्वस्थ और स्वच्छ पर्यावरण का संकेत देती है ।

दिनेश कुमार प्रजापति/वाराणसी। आधुनिकता की दौड़ एवं मोबाइल टॉवरों के रेडिएशन से विलुप्त हो रही गौरैया का संरक्षण हमारी पृथ्वी के पर्यावरण हेतु बहुत उपयोगी है। घर आंगन से विलुप्त हो रही गौरैया की घर वापसी एक स्वस्थ और स्वच्छ पर्यावरण का संकेत देती है । आधुनिकता की दौड़, पक्के घर और घरों की छत पर सुरक्षा के लगवाए जाने वाले जाल, मोबाइल टॉवरों के रेडियशन, फलों एवं सब्जियों, अनाज में प्रयुक्त होने वाले कीटनाशक से पर्यावरण संतुलन में बड़ी भूमिका का निर्वहन करने वाली गौरैया को नुकसान पहुंच रहा है। गौरैया का संरक्षण पारिस्थितिक संतुलन , जैव विविधता और मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यंत जरूरी है। वे न केवल कीड़े-मकोड़ों को नियंत्रित करती हैं, बल्कि शहरी व ग्रामीण इलाकों में पारिस्थितिक चक्र को बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं। आधुनिक घरों में घोंसले के स्थान की कमी और बढ़ते प्रदूषण के कारण इनकी संख्या कम हुई है, इसलिए इन्हें बचाना मानव हस्तक्षेप के माध्यम से बहुत महत्वपूर्ण है। गौरैया हमेशा से इंसानों के घरों और आसपास रहने वाली प्रजाति रही है। गर्मियां शुरू हो गई हैं। सभी को चाहिए कि छत पर दाना-पानी रखें, घरों में लॉन एवं बगीचा में लगे पेड़-पौधों पर कीटनाशक दवाओं का छिड़काव न करें। रसोई में बचे खाद्य, भोजन आदि को फेंकने की जगह खुली जगह पर बिखेर दें। घर की छतों पर अनाज के दाने बिखेरने की परंपरा हम भूल चुके हैं, उसे फिर से अपनाने की जरूरत है । इन छोटे-छोटे प्रयासों से हम इस नन्हीं चिड़िया को अपने घर-आंगन में वापस ला सकते हैं और इसके संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

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