Nayer Azam/पटना, बिहार।बिहार की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत हुई है। भाजपा नेता सम्राट चौधरी ने बिहार के 24वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली है। यह केवल एक शपथ ग्रहण नहीं है, बल्कि बिहार की राजनीति के दो सबसे बड़े परिवारों—नीतीश कुमार और शकुनी चौधरी—के बीच दशकों पुराने संबंधों का एक सुखद परिणाम भी है।
शकुनी चौधरी का वो अहसान और नीतीश का रिटर्न गिफ्ट
बात साल 2000 की है, जब नीतीश कुमार पहली बार मुख्यमंत्री बने थे। उस समय उनके पास बहुमत की कमी थी और वे मात्र 7 दिन ही पद पर रह पाए थे। उस कठिन समय में शकुनी चौधरी उन चुनिंदा नेताओं में शामिल थे, जिन्होंने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनवाने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। आज, 26 साल बाद नीतीश कुमार ने सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँचाकर शकुनी चौधरी का वो ‘पुराना कर्ज’ उतार दिया है।
जेल की सलाखों से सत्ता के शिखर तक का सफर
सम्राट चौधरी का राजनीतिक सफर चुनौतियों भरा रहा है। दिलचस्प बात यह है कि उनके करियर की शुरुआत जेल जाने के बाद हुई, जिसका कारण लालू यादव थे। जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने आरजेडी (RJD) का दामन थामा और लालू यादव से जिद करके पहली बार मंत्री पद हासिल किया। इसके बाद वे भाजपा में शामिल हुए और अपनी मेहनत व सांगठनिक क्षमता के दम पर प्रदेश अध्यक्ष और अब मुख्यमंत्री के पद तक पहुँचे।
लव-कुश समीकरण की जीत
बिहार की राजनीति में ‘लव-कुश’ (कुर्मी-कुशवाहा) वोट बैंक का बहुत महत्व है। 90 के दशक में जब लालू यादव का दबदबा था, तब शकुनी चौधरी ने ही मुंगेर और खगड़िया जैसे इलाकों में समाजवादियों को संगठित किया था। उन्हीं की मेहनत का नतीजा था कि 2005 में नीतीश कुमार को पूर्ण बहुमत मिला। अब सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने से इस समीकरण को नई मजबूती मिली है।
“मेहनत रंग लाती है”: भावुक हुए पिता शकुनी चौधरी
अपने बेटे के मुख्यमंत्री बनने पर पूर्व दिग्गज नेता शकुनी चौधरी ने खुशी व्यक्त करते हुए कहा, “यह ईश्वर की कृपा और वर्षों के संघर्ष का फल है। हमने लव-कुश समीकरण बनाया, समता पार्टी बनाई, बहुत लड़ाइयाँ लड़ीं। आज नरेंद्र मोदी, अमित शाह और नीतीश कुमार की कृपा से सम्राट आगे बढ़े हैं। सच है कि जो मेहनत करता है, वो एक न एक दिन सफल जरूर होता है।”