उत्तर प्रदेश

पावर कॉरपोरेशन मुख्यमंत्री के निर्देशों की कर रहा अनदेखी

मानदेय बढ़ाने के बजाय कर रहा संविदा कर्मियों की छंटनी

NIT -News

लखनऊ। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश के केंद्रीय पदाधिकारियों ने प्रदेश के मुख्यमंत्री माननीय योगी आदित्यनाथ से तत्काल हस्तक्षेप की मांग करते हुए कहा है कि पावर कॉरपोरेशन में संविदा एवं आउटसोर्स कर्मियों के साथ गंभीर अन्याय किया जा रहा है।

अत्यंत अल्प वेतन पर कार्य कर रहे इन कर्मियों की न केवल अनदेखी की जा रही है, बल्कि उन्हें बड़े पैमाने पर सेवा से हटाया भी जा रहा है, जिससे उनके सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है।

संघर्ष समिति ने बताया कि मुख्यमंत्री के निर्देशानुसार प्रदेश के सभी विभागों में संविदा कर्मियों के हितों की रक्षा के उद्देश्य से आउटसोर्स निगम की स्थापना की गई है। इसके विपरीत, पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन ने दिसंबर माह में शासन को पत्र लिखकर स्वयं को आउटसोर्स निगम से अलग रखने की मांग की थी, जिससे उनकी मंशा स्पष्ट हो गई है। अब यह तथ्य सामने आ रहा है कि प्रबंधन जानबूझकर संविदा कर्मियों को इस सुरक्षा व्यवस्था से बाहर रखना चाहता है।

संघर्ष समिति के अनुसार, पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन बड़े पैमाने पर निजीकरण का मार्ग प्रशस्त करने के उद्देश्य से संविदा कर्मियों की छंटनी कर रहा है। मध्यांचल विद्युत वितरण निगम द्वारा जारी एक आदेश में कहा गया है कि ‘वर्टिकल व्यवस्था’ लागू होने के बाद हटाए गए संविदा कर्मियों की सूची तैयार की जाए तथा 01 अप्रैल 2026 से ERP व्यवस्था के अंतर्गत उन्हें वेतन नहीं दिया जाएगा। साथ ही, बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स द्वारा निर्धारित सीमित संख्या में ही संविदा कर्मियों को वेतन दिए जाने का निर्णय लिया गया है, जिससे हजारों कर्मियों के भविष्य पर संकट मंडरा रहा है।

संघर्ष समिति ने यह भी बताया कि अक्टूबर 2024 में लेसा क्षेत्र में 171 संविदा कर्मियों को हटाया गया था। हाल ही में अमौसी क्षेत्र से 25 कर्मियों को हटाया गया तथा लेसा में 56 कंप्यूटर ऑपरेटरों को सेवा से बाहर कर दिया गया, जबकि ये सभी वर्षों से कार्यरत थे। आगामी 01 अप्रैल 2026 से लेसा में लगभग 326 और संविदा कर्मियों को हटाए जाने की तैयारी है।

संघर्ष समिति ने आरोप लगाया कि जहां एक ओर अन्य विभागों में मुख्यमंत्री के निर्देशानुसार संविदा कर्मियों का मानदेय बढ़ाकर न्यूनतम 16,000 रुपए प्रतिमाह किया जा रहा है, वहीं पावर कॉरपोरेशन में इसके उलट व्यापक स्तर पर छंटनी की जा रही है। यह न केवल संवेदनहीनता का परिचायक है, बल्कि निजीकरण के एजेंडे को आगे बढ़ाने की सुनियोजित कोशिश भी है।

संघर्ष समिति ने कहा कि बिजली कर्मियों के अथक प्रयासों से विद्युत वितरण निगमों की रेटिंग में सुधार हो रहा है, इसके बावजूद प्रबंधन ‘वर्टिकल रिस्ट्रक्चरिंग’ लागू कर संविदा कर्मियों को हटाने और नियमित कर्मचारियों के बड़े पैमाने पर स्थानांतरण में जुटा है। इसका प्रतिकूल प्रभाव आने वाली गर्मियों में राजधानी लखनऊ सहित प्रदेश की विद्युत व्यवस्था पर पड़ सकता है।

संघर्ष समिति ने स्पष्ट किया कि बिजली कर्मी वर्तमान में निजीकरण के विरोध में शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे हैं और उपभोक्ताओं को किसी प्रकार की असुविधा नहीं होने दे रहे हैं। किंतु यदि प्रबंधन ने उत्पीड़न की यह नीति बंद नहीं की, तो भीषण गर्मी में व्यापक आंदोलन के लिए बाध्य होना पड़ेगा, जिसकी समस्त जिम्मेदारी प्रबंधन की होगी।उल्लेखनीय है कि पूर्वांचल एवं दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगमों के निजीकरण के विरोध में चल रहे आंदोलन के 483वें दिन भी प्रदेश के विभिन्न जनपदों में बिजली कर्मियों का विरोध प्रदर्शन जारी रहा।

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